Wednesday, August 25, 2010

अनजाने मुसाफिर को समर्पित

यादों की गठरी समेटे हुए और अपनी ही धुन में
सड़क के किनारे
अकेला मुसाफ़िर चला जा रहा था
गठरी थी उसकी खुली जा रही ,
यादें संभाले संभलती नहीं थीं
कभी ग़म निकल कर चुभन दे रहे थे,
खुशियाँ कभी थीं उसको
खिझातीं
तभी एक साथी पुराना मिला
बोला कब तक ये गठरी सँवारे रहोगे
इसे फ़ेंक दो, आग इसमें लगा दो
रफ़्तार तुम ज़िन्दगी की बढ़ा दो
नई ज़िन्दगी के सफ़र पर निकल लो
फिर नयी एक गठरी सजा लो
वह रुका, थोडा सोचा और
रफ़्तार अपनी बढा ली.

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